Hindi poem

इक गुफ्तगू !

इश्क़ में दान करना पड़ता है, जां को हलकान करना पड़ता है।

और तजुर्बा मुफ्त में नहीं मिलता, पहले नुकसान करना पड़ता है।

उसकी बे लब्ज गुफ़्तगू के लिये, आंख को कान करना पड़ता है।

फिर उदासी के भी तक़ाज़े हैं, घर को बीरान करना पड़ता है।

– मेहशार आफरीदी

इश्क़ में समर्पण हो, तो जान कुर्बान ही सही !

कीमती तजुर्बे को किया वक्त दान , तो कोई नुकसान नहीं!

खामोशी से गुफ्तगू हो, तो आंखों और कानों का भी काम नहीं!

उदासी आनी है, अधूरी इच्छाओं से !

इश्क एहम के पार हो, तो ना दिखेगा घरका एक भी कोना बीरान कहीं !

– उलुपी

Photo by Thought Catalog from Pexels

4 thoughts on “इक गुफ्तगू !”

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