Hindi poem

दोस्त : सून ! दोस्त : क्या ?

भीड़ में खोने का डर
क्या कम है ?
जो खुद ही के पाक ख़यालो से
तू डरने है लगा !

बहाने लाखो है , एक नहीं
रुकने के लिए।
जो रुकने के डर से
जीतेजी तू मरने है लगा !

दौड़े गा तोड़कर
बैसाखियां एहम की तू ,
तो तेरा डर डरेगा तुझसे
के तू कुछ करने है लगा !

दर्द छलावा है सून
है बहानो का जोगी
जो खुदमे ही खाली सा है
उससे तू क्यों भरने है लगा !

मांझी बन पिछे छूटेगा
गुजरा पल पानी की तरह
जो नजरो के आगे आंधी दिखे
समझले की मंजिल की और तू बढ़ने है लगा !

-उलुपी

2 thoughts on “दोस्त : सून ! दोस्त : क्या ?”

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