Hindi poem

इश्क !

तेरी रूह तक जाने का सफर,
जो चाह तक रुक सा गया था !

तुझसे राह में मिलने का पहर,
पाने की चाह में गुम सा गया था !

वो लाया ये मंजर है के
बगावत कर ही लिए !

ना मांगे दिल से इजाजत,
महोबत कर ही लिए !

ना सुलझी भी थी हकीकत,
इबादत कर ही लिए !

ना जाने वक्त का कहर,
जो राहे यूं मुड़ी थी !

वो अमृत था या फिर जहर,
उम्मीदे यू जुड़ी थी !

फिर भी वो राह चलने की
जुर्रत कर ही लिए !

लेकर सारी जमानत,
शरारत कर ही लिए !

जीकर फिर ईश्क- ए- शहादत,
शराफत कर ही लिए !

– उलुपी

2 thoughts on “इश्क !”

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