Hindi poem

! सपना !

ऐसा कोई सपना है तेरा ?
जिसके लिए महक रहा
तेरा हर नया सबेरा ।
जिसपे शुरू और खत्म है
तेरा फिलहाल बसेरा ।
ऐसा कोई सपना है तेरा ?
जिसके लिए तड़फती आग
तुझे करदेती है सुनहरा ।
जलादेती है नाउम्मीद का
जंगल घनेरा ।
ऐसा कोई सपना है तेरा ?
जिसकी कोशिश में डूबा हर पल है
खूबसूरत सा लहरा ।
जिसके होनेसे जीवन में
कुछ अर्थ है तेरा ।
ऐसा कोई सपना है तेरा ?
ना रुकना उस मंजर पे,
विष घोले भी गर सफेरा ।
पीके जुनून का अमृत,
कर ले मंजिल का फेरा ।
हर शंका को छोड़,
दुआओंका तौफा ले मेरा ।
मुक्कमल हो नेक जो
हर सपना वो तेरा ।
जिले फिर जी भर के,
हर सपना वो तेरा !

– उलुपी

4 thoughts on “! सपना !”

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