Hindi poem

क़यामत तक !

आपके वो पहले दीदार से शुरू हुई एक हसीन दास्तां ..शब्द कम पड़ने लगे, दास्ता सुनाते सुनाते ..वो आपका आपकी पलकों को हौले से उठाना, हया मेरी चेहरे पे छोड दिया करता था ! आपकी उस शरारत भरी हसी से मेरा दिन गुजरा करता था !वो आपका हलके से मेरे करीब से गुजरना दिल की… Continue reading क़यामत तक !

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इश्क !

तेरी रूह तक जाने का सफर,जो चाह तक रुक सा गया था !तुझसे राह में मिलने का पहर,पाने की चाह में गुम सा गया था !वो लाया ये मंजर है के बगावत कर ही लिए !ना मांगे दिल से इजाजत,महोबत कर ही लिए !ना सुलझी भी थी हकीकत,इबादत कर ही लिए !ना जाने वक्त का… Continue reading इश्क !

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शक्ति !

तू प्रेम है, तू मुक्ति है !कार्य की तू शक्ति है !बुद्धि, धैर्य, तू भक्ति है !तू छिनती आसक्ति है !मातृत्व की अभिव्यक्ति है !लक्ष्मी को जनती युक्ति है !आत्मबल की योगिनीतू योनी का सम्मान है !अष्टभुजा फलदायिनी,तू संसार का अभिमान है !भेद क्या इसे स्त्री, पुरुष का ?कण कण में विराजी शक्ति है !नाश… Continue reading शक्ति !

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दोस्त : सून ! दोस्त : क्या ?

भीड़ में खोने का डर क्या कम है ?जो खुद ही के पाक ख़यालो सेतू डरने है लगा ! बहाने लाखो है , एक नहीं रुकने के लिए।जो रुकने के डर से जीतेजी तू मरने है लगा ! दौड़े गा तोड़कर बैसाखियां एहम की तू ,तो तेरा डर डरेगा तुझसे के तू कुछ करने है… Continue reading दोस्त : सून ! दोस्त : क्या ?

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शिक्षक !

क्यूं से कैसे तक ले जाते है जो ,वो है हर जवाब की स्याही ! मेरा मस्तक इनके चरण में हो,के इनसे ज्ञान की हर बूंद है पाई ! समाज को दिशा दिखाते है वो,हमारे अस्तित्व की नीव है इन्होंने बनाई ! कोयलो से हीरे बनाते है सौ,खुशनसीब हो गर इनसे छड़िया है खाई !… Continue reading शिक्षक !

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नफरत से कुर्बत तक !

तेरे बातों से निकली चुभन दिलपे लगी है..जो नफरत बढ़ाए ये कैसी दिल्लगी है ? हम बातोमे उलझने वाले नहीं है..बातोमे ही खयाल सुलझने वाले कहीं है ! खयालों से नफरत गर दिल में पलेगी..कुरबत की राहें फिर कैसे खिलेगी ? गर मुद्दों को फैसले बनाके चलोगे..हकीकत के सिलसिले से कैसे मिलोगे ! जो नजर… Continue reading नफरत से कुर्बत तक !

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मेरे यार !

तेरी गाली से भीहोता है, दिल खुश ।तेरी इक मुस्कान पेकुर्बान है, सब कुछ ! चाहे हो कहीं भी,दुआओ में हमेशा रहता है ।जो मिले तो , " थम जा "वक्त ये पल से कहता है ! छोड़ा है जब जबदुनिया ने मेरा साथ ,हाथो में हमेशा पाया,मैंने तेरा हाथ ! गलतियां दिखाई तुनेमिटाके खोकला… Continue reading मेरे यार !

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नारी !

नरक से भी बत्तर है,जहा नारी का सम्मान नही ! नारी तेरी जननी है ! वासना का सामान नही ! जैसी तेरी करनी है,वहा क्षमा का कोई स्थान नहीं ! बन जाएगी काली गर,उस मंजर से तू अनजान नहीं ! अभीभी समय है बदलजाक्या मा का प्यार याद नहीं ? स्त्रीत्व अंश तुझमें भी है… Continue reading नारी !

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कोई तो आसपास रहता है !

कोई हवाओं की तरह बहता है ।कोई दीवारों की कानो में कहता है ।कोई बन्द दरवाजों में सहता है ।आसपास कोई रहता है ! कोई पास होकर भी जूदा रहता है ।कोई दूर होकर भी जुड़ा रहता है ।कोई अपने में ही मस्त रहता है ।आसपास कोई रहता है ! कोई तुम्हे पाने बहता है… Continue reading कोई तो आसपास रहता है !

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अफसाना !

कई बार यूं होता है कि,अफसाना बातों मै गुम होता है । कभी यादों में घुटता है ।कभी रिवाजों में बंधता है । कई बार यूं होता है कि,सन्नाटों में टहलता है । कभी हालातों से बहलता है ।कभी डर से और पनपता है । कभी यूं भी होता है कि,इरादे से डर जाता है… Continue reading अफसाना !

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कहां चला ?

चला है यूं आंखों में,मंजर तू लेके !दिल की पोटली में,समंदर सा लेके ! किस नज़ारे की तरफहै बढ़ता चला तू ?क्यों समंदर में डूबने कीसाजिश में है तू ? संभालना, कहीं नानजरिए डूबा दे !गहराई से बचनाना जरिए दगा दे ! किस मोड़ पे थमना,ये तय करलेना !जितनी भरी है पोटली,जरा खाली करलेना !… Continue reading कहां चला ?

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इक गुफ्तगू !

इश्क़ में दान करना पड़ता है, जां को हलकान करना पड़ता है। और तजुर्बा मुफ्त में नहीं मिलता, पहले नुकसान करना पड़ता है। उसकी बे लब्ज गुफ़्तगू के लिये, आंख को कान करना पड़ता है। फिर उदासी के भी तक़ाज़े हैं, घर को बीरान करना पड़ता है। - मेहशार आफरीदी इश्क़ में समर्पण हो, तो… Continue reading इक गुफ्तगू !

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सुनो !

अंधेरे को रोशनी से भर देना.. किसी चांद को मुट्ठी मे रख लेना ! रोते हुए बस यूंही हस देना.. मिठाई सी बातों को चख लेना ! घुस्से मे प्यार भी कर कर देना.. तीखासा मरहम लगा लेना ! नाराजी में राजी करवा देना.. शायरी से इस दिल को समझा लेना ! कभी रूठे, तो… Continue reading सुनो !

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कैसे ना मुड़ते ?

P.S. : Please use head phones 🙈 प्यार भरी आवाज़ की पुकार थी, कैसे ना मुड़ते ? मद भरी निगाहों की पुकार थी, कैसे ना मुड़ते ? किस नज़ारे पे अटकी थी नजर ? ये देखने की चाह थी, कैसे ना मुड़ते ? क्या मेरे मुस्कान से आंखों में थी कोई चमक? ये देखने की… Continue reading कैसे ना मुड़ते ?